आंखों ने पढ़ ली दिल की कहानी
मेरा नाम आयशा है मेरी उमर 23 साल है मेरा फिगर गोरा है माई मुंबई के झोपड़पट्टी में रहती हूं ये मेरी अपनी कहानी है जो 2018 में माहीने की 16 तारीख को मैं जब पानी के लिए जा रही थी तो मुझे एक लड़के ने बुलाया और बोला लड़की तुम्हारा नाम क्या है तो मैंने नहीं बताया और वहां से निकल गई हर रोज जब भी पानी के लिए जाती है तो ओ लड़का उसी जगह पर खड़ा मिलता है एक दिन की बात है मुझे कहीं जाने की जल्दी थी तो मैं सोचती हूं कि क्यों न पहले ही पानी भर लू नहीं तो बहुत देर हो जाएगी मगर माई याह इतनी सुबह भी सोच रही थी वाह कोई नहीं होगा मैं अकेली लड़की क्या करुगीमाई ये सोच ही रही थी कि पास में एक बुधिया दादी थी उनको भी कहीं जाना था तो वो मेरे पास आई और बोली आयशा बेटा मैं भी जल्दी कहीं जाने वाली हूं और पानी भी भरना है तो मैं मन ही मन खुश हो गई और बोली दादी मुझे भी बाहर जाना है काम के सिलसिले में मैं भी आज जल्दी पानी भरनाचाहती हूं तो दादी बोली चलो डोनो साथ में चलते हैं फिर हम दादी के साथ पानी भरने जाने लगी तो मैंने देखा कि वो लड़का उसी जगह इतनी सुबह खड़ा था वो मुझे बस देखता था ना कुछ बोलता ना कहता बस मुझे देखकर मुस्कुराता रहता था माई दादी के साथ पानी भरने लगी तो वाह भी आकार खड़ा होगया था मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या चाहता है, मैं वहां से सीधे पानी लेकर आई और काम के सिलसिले में बाहर चली गई मुझे जाते देख वो मेरे साथ आने लगा, एक कंपनी में काम की बात कर रही थी तो वो वाहा भी आ गया था वाहा का मैनेजर ने काहा की लड़की ये तुम्हारे साथ हैहै मैंने हा कर दी क्यों कि मैं डरती थी कि कहीं मेरी वजह से उसकी पिटाई न हो जाए तभी ओ लड़का मुझे देखकर हंसने लगा तो मनेज र ने कहा बाबू याहा आओ तो वो आकार मेरे बगल में खड़ा हो गया तभी मनेज र ने कहा लड़की ये इसी कंपनी में काम करता था मगर ये बात नहीं कर सकता इस लिए इसे निकलना पड़ा इतना सुनकर माई शौक हो गई जैसे मानो मेरे ऊपर कोई बड़ा बोझ रख दिया हो मैंने अपने आप को संभालना चाहा मगर मुझे चक्कर आने लगा तो उसने मुझे पकड़ लिया और मुझे एके बेंच पर बिठा दिया तभी मैंने देखी कि वो मेरे लिए पानी लेकर आया और मुझे अपने हाथो से पिलाने लगाये देखकर मनेजर ने कहा कि वो लड़की तुम्हारा नाम क्या है तो मैंने धीरे से कहा आयशा तो मैनेजर ने कहा कि वो तुमको पसंद करता है और तुमसे कुछ कहना चाहता है ये सुनकर जब उसकी तरफ देखी तो उसने अपना शहर हिलाया और मुझे इसारे में समझा की कोशिश करने लगा तभी मेन मैनेजरटेबल से पेन और पेपर उठा कर उसको दी और बोली उसको लिखने को तो वह कलम चलाते वक्त रोते हुए लिखे जब मैंने देखा कि जो वो लिखना चाहता है वो उसकी आखे बया कर रही है तो मैंने उसे इस्तेमाल किया अपने साइन से लगाया और बोली क्या बात है क्यों रो रहे हो तो उसने इतनी कड़वी बात लिखी जिसकोदेख कर वाहा के कार्यकर्ता और मैनेजर की आंखों में आंसू आ गए मैनेजर ने कहा कि आयशा बेटा देखो मेरी कोई लड़की नहीं है ना लड़का है मैं आज से तुम्हें अपनी बेटी मानता हूं तो मैं भी भावुक होकर रह गई हूं कि मेरे भी माता पिता मुझे बोझ समझ कर फेंक दिया आज मै भी अपने मम्मी पापा याद करती हू मगर उनको अपने प्यार के आगे मुझे घर से निकलना पड़ा क्योंकि मेरी मम्मी की हालत खराब हो गई थी और अस्पताल में ही वो ऊपर वाले के पास चली गई उसके बाद पापा ने मेरी खातिर दूसरी सदी की मेरी सौतेली मां ने मुझे हमेशा मारा और गलियां देती हूं बस देखती हूं रहती कुछ भी नहींबोलती एक दिन उसने पापा के बहार जाते ही मुझे साथ लेकर इसी झोपड़पट्टी में आई और मुझे बोली यहीं रहना तेरे पापा आएंगे तुझे लेने माई अकेली दारी सही वही बैठ कर अपने पापा का इंतजार करने लगी सुबह से सैम हो गई मगर पापा नहीं आए माई अकेली पूरी रात वही बैठी थी पर पापा नहींआए तब सुबह में पास के झोपड़े से एके दादी ने मुझे देखा और मुझे अपने साथ अपने झोपड़े में ले लिया और बोली बेटा कौन हो मैं कुछ नहीं बोलती बस चुप थी तो उसने मुझे खाना खिलाया और अपने पास में सुलाया महिनो बिट गई कोई नहीं आया उसको लेने तो दादी ने कहा बेटा तुम यही इशी जगह रहोमैं तुम्हारे साथ हूँतब से अब तक मैं यहीं हूं मानेगर ने मेरी बात सुनकर बोला देखो मैं तुम्हारी शादी इसी लड़के से कर देता हूं ये तुम्हें खुश रखेगा क्योंकि एके गूंजे की जुबान उसकी आंखें होती हैं जो हर बात की समझ देती है फिर हम दोनों की शादी हो गई और मैनेजर ने मुझे अपनी बेटी मानकर मुझे रहने कोघर दिया और पूरा सामान भी मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था मेरे शादी के 6 महीने बाद मेरे हसबंद का निधन हो गया मैं फिर से अकेली हो गई थी और मैनेजर भी वाहा से जा चुके थे क्योंकि जिस कंपनी में काम करते थे वो नुकसान में चली गई अब मेरे पास बस वही एके घर था जो जीने कासहारा था मैंने सोचा अब मुझे फिर से उसी झोपड़पट्टी में जाना पड़ेगा जहां से आई थी मैं घर बेचकर सारा सामान लेकर इसी देवा में आई यहां भी मुझे दुख ही देखने को मिला क्यों कि जो दादी ने मुझे आसरा दिया था वह भी नहीं रह रही थी जब किसी पेड़ के जद में जान रहेगी तो पत्ते हमेशा खिलते रहेंगे मगर मेरा तो कोई था ही नहीं तो जड़ और पत्ते कहा से होंगे मैंने घर के पैसे से दादी का अंतिम संस्कार किया और उसी झोपड़पट्टी में रहने लगी और एक विधवा की जिंदगी जीने लगी मेरी जिंदगी का पहिया कैसे आगे बढ़ा अगले भाग में बताऊंगी
समाप्त ।

No comments: